भूंख – अन्न का हर दाना ज़रूरी है…

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घर से निकला मैं सुबह सुबह,
भर पेट नाश्ता करके जी,
इडली-डोसा और चाउमीन,
दो प्लेट पास्ता भर के जी।

एक मित्र से मिलना था मुझको,
तो जाने की भी जल्दी थी,
ये प्लेट नाश्ते की मुझको,
देरी का कारण व्यर्थ लगी।

कुछ खाया और कुछ छोड़ दिया,
भोजन से बस मुख मोड़ लिया,
मैं उठा, त्वरित गति धारण की,
निज दिशा मरातिब दौड़ लिया। (मरातिब – मंज़िल)

कुछ दूर चला पैदल-पथ पर,
एक दीन भिक्षु पर नज़र पड़ी,
थे हाँथ मांगने को आतुर,
आंखों में थी उम्मीद बड़ी।

मैं ठिठका कुछ देने को पर,
बोला एक शह छोटी दे दो, (शह – मदद)
नहीं पैसे की है चाह मुझे,
भूँखा हूँ, एक रोटी दे दो।

उस वक़्त न था कुछ पास मेरे,
जो उसकी भूंख मिटा पाता,
ना भोजन था न वक़्त पास,
जो संवेदना दिखा पाता।

उससे छुटकारा पाने को,
दो रुपया दे उपकार किया,
जल्दी थी मुझको जाने की,
सो अपना पल्ला झाड़ लिया।

फिर मित्र मिला, कुछ बातें कीं,
और समय कार्य में बीत गया,
दोपहर बाद तृष्णा जागी,
तब हृदय ‘शैल’ फिर भीग गया।

वापस लौटा, मन व्याकुल था,
मन में प्रश्नों का अम्बर था,
ये विकल भाव विकराल हुआ, (विकल – व्याकुलता)
कुछ प्रथक वहां का मंजर था।

लोगों का जमघट लगा हुआ,
सबका चेहरा तमतमा हुआ,
एक भाव अजब महसूस किया,
क्रोध और दर्द से सना हुआ।

मैं भीड़ चीर आगे पहुंचा,
विचलित वो दृश्य कर रहा था,
एक रोटी उसे नसीब नहीं,
एक जीव भूंख से मर रहा था।

मुख भावशून्य, हर अंग शिथिल,
नख, नेत्र, अधर, सब सूखा था,
मैं छह घंटे नहीं रह पाया,
वो तो छह दिन से भूँखा था।

यह दृश्य देख मन कांप गया,
तन क्षुधा वेदना माप गया,
मैं व्यथित था इतने से दुख से
मृतप्राय समंदर नाप गया।

सोंचा कुछ इसकी मदद करूं,
सर्वप्रथम काम एक अदद करूं,
अब इसकी भूंख मिटाऊं मैं,
बस अन्न कहीं से लाऊं मैं।

मैं मुड़ा, काल गति मोड़ गया,
एक पल में सब कुछ छोड़ गया,
फिर सुबह का मंजर पलकों में,
चलचित्र की भांति दौड़ गया।

अर्जुन को कृष्ण ने दिखलाया
जो रूप, वही देखा मैंने,
कितनों की तृप्ति करता वो,
जो अन्न सुबह फेंका मैंने।

निज घृणा भाव से बोझिल था,
मैं खुद के प्रति धिक्कार लिए,
जड़मत हो वहीं खड़ा था मैं,
मन पर सौ मन का भार लिए।

निष्प्राण देह, निर्जन समूह,
निर्ममता का ही फेरा था,
कुछ सिक्के हाँथ से फिसल पड़े,
उनमें एक सिक्का मेरा था।

कहो स्वजन से और खुद भी
निज मन से यह संवाद करो,
जितना आवश्यक उतना लो,
मत अन्न को तुम बर्वाद करो।।

बचा सको जब भी तो रख लो, अन्न व्यर्थ फिक जाने से,
भूंख कृष्ण की मिट जाती है, चावल के एक दाने से।।

शैल जौहरी ‘साहिल’

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