इस होली में… – परिवार के साथ होली की दोगुनी खुशियाँ…

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पिता है ज्योति अनुशासन की,
माता – हिम् का अंश प्रसंग, (प्रसंग – संबंध, लगाव)
इस होली में हम पर बरसे,
आशीष और स्नेह के रंग।।

रंग खूब अबीर गुलाल उड़े,
रंग के प्रियजनों के गाल उड़े,
रंग प्यार का ऐसा घुल जाये,
हर दिल से हर एक मलाल उड़े।
वाणी में घुल जाये पियूष,
रंग पानी की बौछार घुले,
इस होली सब यों महकें,
ज्यों हवा में दिव्य तुषार घुले। (तुषार – खुशबू)

दिन में बरसे रंग और गुलाल,
और साँझे पूनम पियूष,
सब करते तान्या परंपरा की, (तान्या – मूल)
अमर बेल महसूस।
गुजिया का आनंद लो भैया,
शिवम् पेय के संग, ( शिवम पेय – भांग)
इस होली में जमकर खेलें,
करें प्रेम हुड़दंग।
होली के रंगों में रंग दें,
धरती – गगन विशाल,
शैल-शिखर, वन-उपवन रंग दें,
रंग दें हर सुर ताल।
राग भी रंग दें, लए भी रंग दें,
रंग दें सब मुद्रांक,
शीतलता में सब कुछ रंग दें,
जैसे रंगा शशांक

लाल, हरा, नीला और पीला,
केसरिया या धानी,
प्रेम रंग ही चटक बतातीं,
राधा, सिया, शिवानी

आओ मनाएं मिलजुल कर सब,
खुशियां बड़ी या छोटी,
चमक प्यार की बनी रहे ,
ज्यों स्वाति बूँद का मोती।
दीप-शिखा की ज्योति जैसी,
जगमग हो मुस्कान,
यही प्रेम और सम-विचार अब,
अपनी हो पहचान।

उस शिल्पी से यही प्रार्थना,
करूँ झुका के शीश,
सबकी हर आकांक्षा,
पूरी करना ईश।

शैल जौहरी ‘साहिल’


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