राजनैतिक बयानबाजी पर कवि का व्यंग्य

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कवि दुष्यंत कुमार जी की पंक्तियों से प्रभावित, आजकल की राजनैतिक बयानबाजी पर कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ …. (हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए) …..

ये सियासत आग जो इस मुल्क़ में सुलगा रही,
उसकी लपटों में ये खुद भी तो झुलसनी चाहिए,
धर्म और जाति पे हमको बांटती अब तक रहीं,
वो सियासी ताक़तें अब खुद बिखरनी चाहिए,

ये अली और वो बली में, फ़र्क़ करके बांटते,
ताक़त-ए-वोटर से ये, मंशा सुधरनी चाहिए,

अंतःवस्त्रों में घुसे हैं, ये सियासतदार अब,
नग्नता इनकी ज़माने पर, उघड़नी चाहिए,

कर्ज़ माफी और रुकड़ा मुफ़्त में देने से और,
कृषक की हालत बिगड़ती है, संभलनी चाहिए,

ठीक है सारे जहां को, तुमने कर डाला मुरीद,
अपनो की भी सिसकियाँ और आह सुननी चाहिए,

ये उन्हें हैं चोर कहते, वो इन्हें कहते गधा,
ये ज़ुबां है ग़र सियासत की, कतरनी चाहिए,

अब सियासत का महज़, ये अर्थ बाक़ी रह गया,
हो किसी के सर की पगड़ी, बस उछलनी चाहिए,

हो शहीदों के क़फ़न पे, या वतन को तोड़कर हो,
हर दशा में राज की, नीति चमकनी चाहिए।।

ये सियासत आग जो इस मुल्क़ में सुलगा रही,
उसकी लपटों में ये खुद भी तो झुलसनी चाहिए,

शैल जौहरी ‘साहिल’

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