मसरूफ़ियत : ज़िन्दगी से फुर्सत के कुछ पल चुराने की जद्दोजेहेद …

मसरूफ़ियत (Masroofiyat) लहरों पे चलते चलते, यूँ दूर निकल आये, अब ठहरे समंदर के साहिल को…

राजनैतिक बयानबाजी पर कवि का व्यंग्य

कवि दुष्यंत कुमार जी की पंक्तियों से प्रभावित, आजकल की राजनैतिक बयानबाजी पर कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत…

जनता और सत्ता – राजनीतिक व्यंग्य

हर चुनाव में नेता करते, जनता की मनुहारी, और बाद ऐसे दुत्कारें, जैसे कोई भिखारी, राजनीति…

इस होली में… – परिवार के साथ होली की दोगुनी खुशियाँ…

पिता है ज्योति अनुशासन की, माता – हिम् का अंश प्रसंग, (प्रसंग – संबंध, लगाव) इस…

भूंख – अन्न का हर दाना ज़रूरी है…

घर से निकला मैं सुबह सुबह, भर पेट नाश्ता करके जी, इडली-डोसा और चाउमीन, दो प्लेट…

तेरी याद…

तेरी याद पलकें भिगोने लगी है, ये ग़म में मुझे अब डुबोने लगी है, बमुश्किल लबों…

ग़ज़ल – तुम्हारी पायलें ….

ग़ज़ल – तुम्हारी पायलें —- शिकायत है हमें इनसे, ये आठों याम करती हैं, तुम्हारी पायलें…

आज फिर तुम हमें याद आने लगे…

गीत –  आज फिर बारिशों की है महफ़िल सजी, आज फिर तुम हमें याद आने लगे,…

और वो शाम यूँ ही गुज़रती रही…

उदासियों की ज़मीं पर,तन्हाइयों की गोद में,मेरे दिल की धड़कन,किलकारियां भरती रही,फिर एक नई सुबह के…

कलयुग के रावण का अंत करने राम को आना ही होगा….

गीत – राम को आना पड़ता है… ************************ जब जब इतिहास को वर्तमान, दोहराकर कठिन सवाल…

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